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टेटनस (tetanus)

टेटनस (Tetanus)

यह Clostridium tetanus नामक जीवाणु के संक्रमण से उत्पन्न एक तीव्र संक्रामक रोग है जिसमें जबड़े भिंच जाते (Trismus or “Lock jaw’) हैं और शरीर ऐंठ जाता है, यह सिर एवं एड़ियों के सहारे पृथ्वी पर टिका होता है तथा इसका बीच का भाग ऊपर को उठ जाता है जिससे यह धनुष के समान (Opisthotonus) दिखायी देता है। चेहरे की पेशियों में ऐंठन आ जाने से चेहरा हँसता हुआ-सा (Risus sardonicus) नजर आता है। टेटनस रोग अधिकतर प्राणघातक होता है, 40-80% रोगियों की मृत्यु हो जाती है।

रोग का संचारण

रोगोत्पादक जीवाणु प्राकृतिक रूप से सामान्यतः मिट्टी और धूल में पाये जाते हैं तथा शाकाहारी जन्तुओं जैसे मवेशियों, घोड़ों, बकरियों एवं भेड़ों की आँत में पाये जाते हैं और उनके मल में उत्सर्जित होते रहते हैं। इनके बीजाणु प्रकृति में वर्षों तक जीवित रहते हैं और धूल में मिले हुए इधर-उधर उड़ते रहते हैं। सामान्यत: 5 से 40 वर्ष तक की आयु के व्यक्ति के शरीर में कहीं पर बने जख्म या खरोंच के मिट्टी, धूल, गन्दे कपड़ों आदि के सम्पर्क में आने से दुषित हो जाने पर अथवा संक्रमित लोहे की वस्तु से चोट लग जाने पर बने जख्म से, जख्म या खरोंच पर मिट्टी या गोबर आदि लगा लेने पर यह रोग हो जाता है। शिशुओं में विशेष रूप से नवजात शिशु में जन्म से टेटनस (Tetanus neonatorum) हो जाता है जब सफाई के साथ प्रसव नहीं कराया जाता है, जब नाभि-रज्जु (Umbilical cord) को गन्दे औज़ार से काट दिया जाता है या नाभि-स्थूणक अथवा ठूंठ (Umbilical stump) की राख, मिट्टी या गोबर से मरहम पट्टी कर दी जाती है। स्त्रियों में विशेष रूप से प्रसव या गर्भपात के दौरान सफाई न रहने से, मासिक धर्म के दौरान गन्दे कपड़ों का प्रयोग करने पर उन्हें यह रोग हो जाता है।

रोकथाम

निम्न दो प्रकार की वैक्सीनों में से किसी का प्रयोग करके शिशुओं एवं बच्चों में रोगक्षमता उत्पन्न की जाती है।

  • a. DPT वैक्सीन
  • b. Tetanus toxoid वैक्सीन

DPT वैक्सीन

DPT वैक्सीन डिफ्थीरिया, काली खाँसी तथा टेटनस, इन तीन रोगों के प्रति रोगक्षमता उत्पन्न करने के लिए ट्रिपल वैक्सीन होती है। टेटनस की रोकथाम के लिए इसका शिशुओं एवं बच्चों में प्रयोग किया जाता है। इसका वर्णन पीछे डिफ्थीरिया के प्रसंग में किया गया है।

Tetanus toxoid वैक्सीन

इसके 0.5 मिली. के 1 से 2 माह के अन्तराल पर बाँह में दो इन्जैक्शन लगाये जाते हैं, फिर एक वर्ष बाद एक और इन्जैक्शन लगाया जाता है। वयस्कों में 5 वर्ष बाद एक और इन्जैक्शन, कुल चार इन्जैक्शन (गर्भवती स्त्री के इन्जैक्शन सहित) लगाये जाते हैं।